मुश्किलें थाम रही ‘खेल परियों’ की परवाज, बेडिय़ां भी डाले तंगी और रस्मो-रिवाज
- अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में चयनित बहनें कर रही संघर्ष, आड़े आ रही कई समस्याएं
- तीनों बहनों ने ताईक्वांडो में जीत रखे हैं दर्जनों पदक
हनुमानगढ़. मुश्किलें खेल परियों की परवाज थामने की फिराक में हैं। आर्थिक तंगी और रस्मो-रिवाज भी बेडिय़ा बन जाना चाहती हैं। इसके बावजूद वो मुश्किलात को अपने मुक्कों और लात से हरा देना चाहती हैं। विदेश में तिरंगा लहरा देना चाहती हैं। लेकिन पिता की खराब माली हालत उनके ख्वाबों के हकीकत बनने में खलल डाल रही है। माता-पिता अपनी तीनों बेटियों के गले में सोने के मेडल देखने की ख्वाहिश में निरंतर संघर्ष कर रहे हैं। हनुमानगढ़ जंक्शन के हाऊसिंग बोर्ड निवासी अकरम खान व रजिया बेगम रस्मो-रिवाज और तंगहाली से लड़ते हुए बेटियों के अंतरराष्ट्रीय ताईक्वांडो प्रतियोगिता (बैंकाक) में भाग लेने का खर्च जुटाने के लिए जोड़-घटाव में लगे हुए हैं। बेटियों को बेटों से बेहतर समझने वाले यह दंपती इन दिनों फिक्रमंद हैं कि बच्चियों के अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में जीतकर देश का नाम रोशन करने के सपने को टूटने नहीं दिया जाए।
पीडब्ल्यूडी में ठेकेदारी का कार्य करने वाले पांचवीं तक पढ़े अकरम खान की बेटियां कई राष्ट्रीय तथा एक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेल चुकी हैं। फिलहाल आर्थिक तंगी के कारण उनके माथे पर चिंता की लकीरें हैं। लेकिन बेटियों की मेहनत और प्रतिभा देखकर उनका सीना गर्व से फूल जाता है। हालांकि जब अकरम खान की बड़ी पुत्री शाईना (20) व शिमनान (18) ने पिछले साल कैंडी, श्रीलंका में साउथ एशियन ताईक्वांडो चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीता तो वे जयपुर में तत्कालीन खेल मंत्री गजेन्द्रसिंह खींवसर से मिले। उनसे आर्थिक सहायता की मांग भी की। मगर सिवाय आश्वासन के कुछ नहीं मिला।
प्रतिभावान चिरैया की तिकड़ी
मूलत: टिब्बी तहसील के गांव सूरेवाला निवासी अकरम खान पिछले कई साल से हाऊसिंग बोर्ड रहते हैं। उनकी बड़ी बेटी शाईना व उससे छोटी शिमनान का चयन इंटरनेशनल ताईक्वांडो प्रतियोगिता तथा इंटरनेशनल ताईक्वांडो चैम्पियनशिप के लिए हुआ है। यह दोनों प्रतियोगिताएं इस साल क्रमश: मार्च व जुलाई में बैंकॉक में होगी। मगर खराब आर्थिक स्थिति के चलते उनका स्पर्धा में भाग लेना मुश्किल होता जा रहा है। दोनों बहनों ने पिछले माह चंडीगढ़ में सम्पन्न नेशनल चैम्पियनशिप में भी स्वर्ण पदक जीते थे। वे अब तक दर्जनों पदक जीत चुकी हैं। इनकी छोटी बहन नाजनीन ताईक्वांडो व स्केटिंग दोनों में जौहर दिखा रही है। वह स्केटिंग की राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में रजत व स्वर्ण पदक जीत चुकी है। जबकि ताईक्वांडो की स्टेट चैम्पियनशिप में भी वह स्वर्ण पदक जीत चुकी है। तीनों बहनें खेल के साथ पढ़ाई में भी बहुत होशियार हैं।
लड़ रहे दोहरी जंग
रजिया बेगम व अकरम खान दोहरी जंग लड़ रहे हैं। समाज के रस्मो-रिवाज और टीका-टिप्पणी की परवाह किए बगैर वे बेटियों को अच्छी परवरिश देकर उन्हें आगे बढऩे के लिए पूरा प्रोत्साहन दे रहे हैं। ताईक्वांडो जैसे खेल में आगे बढ़ा रहे हैं। साथ ही खराब आर्थिक स्थिति से भी संघर्ष कर रहे हैं। आठवीं तक पढ़ी रजिया बेगम का कहना है कि मां-बाप के हक में बेटियां ज्यादा बेहतर हैं। उनको आगे बढ़ाना समाज व देश की तरक्की के लिए जरूरी है। इसलिए सुरक्षा के लिहाज से ऐसे खेल भी आवश्यक हैं।
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यह परिवार बदलाव की बयार सा
रजिया बेगम व अकरम खान का परिवार कन्या भ्रूण हत्या के लिए बदनाम हनुमानगढ़ में राहत की बयार जैसा है। 2011 की जनगणना के अनुसार जिले का बाल लिंगानुपात 869 के खतरनाक स्तर पर था। इसकी मुख्य वजह कन्या भ्रूण हत्या ही मानी जाती है। ऐसे में किसी के केवल तीन बेटियां होना और उनको अच्छी शिक्षा दिलाकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं में जौहर दिखाने लायक बनाना अपने आप में बड़ी बात है। रजिया बेगम का परिवार बेटी बचाओ अभियान के लिए ब्रांड एम्बेसडर जैसा है।
बस यही ख्वाहिश
बेटियां अपनी प्रतिभा व मेहनत के बूते देश व समाज का नाम रोशन करे, यही हमारी ख्वाहिश है। हालांकि आर्थिक समस्याएं हैं। इनके समाधान के लिए गत वर्ष खेल मंत्री से भी मिले थे। मगर कुछ हुआ नहीं। बच्चियों को बैंकॉक में होने वाली स्पर्धा में खिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। - अकरम खान, पिता।
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