बीकानेर . 'गजानन ने ध्याय लो, रिद्धि-सिद्धि लेवो मनाय, बन्ने रा दादोजी गजानंद ने ध्यावो....सरीखे मांगलिक गीतों से विघ्नहरता गणेशजी को मनाया जा रहा है। ताकि सुख-शांति से मांगलिक रस्में पूरी हो जाए। भीतरी परकोटे की गलियां अब मांगलिक गीतों से गूंजने लगी है। पुष्करणा समाज का सामूहिक विवाह समारोह अब महज ११ दिन दूर है। ऐसे में जिन घरों में विवाह समारोह होने हैं उनमें परम्परा के अनुसार मूंग बिखेरे जा चुके हैं। रविवार को कई घरों में घट्टी, सिलबट्टे का पूजन किया गया। बड़ी-बाट बनाया गया। विवाह के साथ ही जिन बटुकों की यज्ञोपवित होने उन घरों में भी मांगलिक गीत गूंज रहे हैं। सामूहिक सावे को संस्थाए सक्रिय हो गई है। इसी माह में 21 फरवरी को एक साथ बड़ी संख्या में सामूहिक विवाह होंगे। पुष्करणा समाज का सावा प्रत्येक दो साल से आता है। इसमें शहर में लगभग हर घर में विवाह समारोह होते हैं।
सदियों पुरानी परम्परा
पुष्करणा समाज के सामूहिक विवाह समारोह की परम्परा सदियों पुरानी बताई जा रही है। उस दौर में हाथधान के बाद एक ही दिन में बारात व भोजन(जान) होता था। साहित्यकार शिवराज छंगाणी के अनुसार पुष्करणा समाज का सावा सैकड़ों साल पुराना है। पांच दशक पूर्व तक तो सावे के दिन ही सभी घरों में विवाह समारोह होते थे। एक साथ इतने विवाह होते थे कि कहावत बन गई कि एक भगोना(धामा) में ही सारे बाराती भोजन कर लेते थे। बारात में बमुश्किल से 30 से 40 लोग मिल पाते थे। आज थोड़ा स्वरूप बदल गया है।
पर्यावरण का ध्यान
वर्षों पहले होने वाले सामूहिक सावे में पर्यावरण का खास ध्यान रखा जाता था। उस दौर में बारातियों को पत्तल में भोजन परोसा जाता था, मिट्टी गिलास में पानी, राबडिय़ा, रायता इत्यादि दिए जाते थे। ताकि किसी तरह का पर्यावरण प्रदूषण नहीं फैले। एक ही दिन में 250 से 300 विवाह होते थे। बिरादरी में जो सबसे बड़ा दूल्हा होता था, बाराती सबसे पहले उसके ससुराल जाते थे, वहां थोड़ा भोजन करते फिर क्रम से छोटे दूल्हे के यहां पहुंचते।
जब उतारते थे नजर
पांच-छह दशक पूर्व जब बारात पहुंचती थी, तो पम्परा के अनुसार नजर उतारी जाती थी। रविवार को अपनी शादी की 55वीं वर्षगाठ मना रहे चंद्रकला देवी-नारायण दास व्यास ने बताया पचपन साल पहले इस दिन पुष्करणा समाज का सावा था, जिसमें विवाह हुआ था, उस समय जब बराती भोजन के लिए वधु के घर पहुंचते थे, तो सबसे पहले एक पात्र में अंगारों में हींग डालकर सबकी नजर उतारी जाती थी। इसके बाद देवी पार्वती के स्वरूप कपड़े की गुड्डिया बिठाई जाती। पम्परा के अनुसार सगे-समधियों के परिचय कराते खास गीत (तम्बोणा) गाए जाते थे। उनका विशेष महत्व था।
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