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Title: ‘अटल’ से संकट टला ना ‘राजीव’ से राहत, पहले भी आफत और अब भी आफत
Author: Vinod Goswami
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‘अटल’ से संकट टला ना ‘राजीव’ से राहत, पहले भी आफत और अब भी आफत - नाम परिवर्तन के सियासी शोर में दबी सुरक्षा प्रहरियों की पीड़ा - सेवा केन...

‘अटल’ से संकट टला ना ‘राजीव’ से राहत, पहले भी आफत और अब भी आफत
- नाम परिवर्तन के सियासी शोर में दबी सुरक्षा प्रहरियों की पीड़ा
- सेवा केन्द्रों की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे प्रहरियों को मजदूरों से भी कम दिहाड़ी
अदरीस खान. हनुमानगढ़. पहले राजीव जी थे। बाद में अटल जी। अब फिर राजीव जी आ गए। मगर मजदूरों से भी कम पगार पर सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे प्रहरियों की तकदीर कोई नहीं बदल सका। नाम बदलने में व्यस्त सरकारें प्रदेश के ग्राम पंचायत व पंचायत समिति मुख्यालयों के सेवा केन्द्रों पर तैनात सुरक्षा प्रहरियों के हाल बदलने में कोई रूचि नहीं दिखा रही। हालात यह हैं कि सुरक्षा प्रहरी जब सेवा केन्द्रों का नाम राजीव गांधी से शुरू होता था तब भी 3800 रुपए पगार पा रहे थे और आज भी उनको उतना ही मानदेय मिल रहा है। बीच में अटल बिहारी जी आए तब भी उनके अच्छे दिन नहीं आए। और अब भी नई सरकार ने केवल पुन: नाम परिवर्तन में ही रूचि दिखाई, प्रहरियों के दिन बदलने में नहीं। मनरेगा मजदूरों से भी कम दिहाड़ी में सुरक्षा का जिम्मा संभाला जा रहा है।
केन्द्र सरकार ने वर्ष 2012-13 में ग्राम पंचायतों तथा पंचायत समिति मुख्यालयों पर भारत निर्माण राजीव गांधी सेवा केन्द्र बनाए। इनकी रात्रि में सुरक्षा के लिए आऊट सोर्सिंग बेसिस के आधार पर प्रहरी नियुक्ति कर उनका मासिक 3822 रुपए मानदेय तय किया। फिर सरकार बदली तो सेवा केन्द्रों से राजीव गांधी का नाम हटाकर अटल सेवा केन्द्र कर दिया गया। कुछ बरस तक अल्प मानदेय पर काम कर प्रहरियों ने इसे बढ़ाने की मांग की। मगर राज्य सरकार पांच साल तक अनदेखी करते हुए अपना कार्यकाल पूरा कर गई। अब फिर से राज्य में कांग्रेस सरकार बनते ही अटल सेवा केन्द्रों का नाम बदलकर राजीव गांधी सेवा केन्द्र कर दिया। मगर नाम परिवर्तन के इस सियासी शोर में सुरक्षा प्रहरियों की पीड़ा की फिर से अनदेखी कर दी गई।
ड्यूटी जब भी अफसर चाहे
जानकारी के अनुसार सेवा केंद्रों पर तैनात सुरक्षाकर्मियों को रात्रि में सुरक्षा के लिए तैनात किया हुआ है। मगर हालात यह हैं कि अधिकारी उनसे अक्सर दिन में भी ड्यूटी करवा लेते हैं। जब भी जरूरत पड़ती है तो अफसर दिन में भी बुला लेते हैं। मगर मानदेय बढ़ाने की मांग वे सरकार का मामला बताकर टरका देते हैं। सरकार ने स्थाई कर्मचारियों को सातवें वेतन का लाभ भी दे दिया। जबकि सुरक्षाकर्मियों का मानदेय छह बरस में एक पैसा भी नहीं बढ़ाया गया।
मजदूरों से भी कम
मनरेगा में न्यूनतम मजदूरी 192 रुपए निर्धारित है। जबकि सेवा केन्द्रों के सुरक्षाकर्मियों को 3822 रुपए मानदेय दिया जाता है। मतलब दिहाड़ी के हिसाब से उनको केवल 127 रुपए ही प्रतिदिन मजदूरी मिल रही है। एजेंसी के माध्यम से भुगतान होने के कारण कई बार इस राशि में भी कैंची चला दी जाती है। जिले की बात करें तो यहां सभी 251 सेवा केन्द्रों पर 21 मई 2013 को सुरक्षा प्रहरी नियुक्त किए गए थे।
बरसों से अनदेखी
सेवा केन्द्रों की सुरक्षा बरसों से कर रहे हैं। मगर एक पैसा भी मानदेय नहीं बढ़ा। जबकि इस अवधि में दो बार तो केन्द्रों के नाम ही बदल दिए गए। लेकिन हमारी हालत बदलने पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। - प्रतापसिंह बेनीवाल, सेवा केन्द्र सुरक्षाकर्मी।
उच्च स्तर पर निर्णय
सेवा केन्द्रों पर तैनात सुरक्षाकर्मियों के मानदेय बढ़ोतरी का निर्णय सरकार स्तर पर ही संभव है। इस संबंध में सुरक्षाकर्मियों ने कई बार ज्ञापन सौंपे। इनकी रिपोर्ट मुख्यालय भिजवा दी गई। - नवनीत कुमार, सीईओ, जिला परिषद।
प्रदेश की फैक्ट फाइल
प्रदेश में कुल सेवा केन्द्र : 9278
इनमें से पंचायत समिति मुख्यालय पर : 245
ग्राम पंचायतों पर कुल सेवा केन्द्र : 9000
जिला मुख्यालय पर जन सुविधा सेवा केन्द्र : 33

 



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